Wednesday, November 23, 2011

सूरज...


ये धूप कितना जलाती है हमें,
अपने से दूर हमेशा भगाती है हमें|
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हम भी कई रूपों में मानते हैं उसे,
गर्मी में दुश्मन तो ठंडी में दोस्त मानते है उसे|
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लेकिन उसकी एहमियत को तो जानते है हम,
यहाँ तक कि उसे भगवान मानते है हम|
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लेकिन वो भगवान यूँ ही नहीं बनता,
खुद को जला कर दूसरों को वो रोशनी है देता|
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दूसरों को जो जलाये उसे इंसान कहते है,
लेकिन खुद को जो जलाये उसे भगवान कहते है|

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