Wednesday, November 23, 2011

बचपन...


हमने कहा सूरज से, “थोड़ी सी हमें धूप दो”|
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उसने पूछा,”क्या करोगे दोस्त मेरी धूप का?”|
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मैंने कहा,
“उसमे खेल कर,
बचपन में फिर से लौट जाऊंगा|
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खो चुका हूँ जिस मासूमियत को,
वापिस उसे फिर लाऊंगा|
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आगे रहने की इस होड़ में,
उस मासूमियत को हमने रौंद दिया|
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खोजने पर भी मुझको,
उसका नामो-निशान तक ना मिला|
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शायद उस धूप से कुछ मासूमियत मै पा सकूँ,
हो सके तो अपने सच्चे दिल का दीदार खुद को करा सकूँ|”

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