Monday, February 7, 2011

एक अनोखी शाम


कहते है मुसीबत जब आती है तो चारों तरफ से आती है. शायद कुछ ऐसा ही हुआ हमारे साथ  उस  शाम . वो  शाम कई मायनों में हमारे लिए यादगार है.
उस शाम को मै और मेरे दो दोस्त(मयंक जोशी और देबानंद माझी) सरस्वती पूजा के लिए मूर्ति ले कर जा रहे थे. देबानंद को छेंडमें और मुझे और मयंक को बासंती कालोनीमें मूर्ति देना था. हम तीनो ने एक छोटी सामान उठाने वाली गाड़ी बुक की. मूर्ति खरीद कर हम पहले छेंड की तरफ की चले. उस समय हम मस्ती करने के मूड में थे; इसीलिए हमने decide किया की हम ट्रक के पीछे खड़े हो कर चलेंगे. पहले मै और देबानंद पीछे खड़े हुए. वो शाम का मनोहर मौसम और उस पर छेंड का सुहावना सफ़र; बड़ा मजा आ रहा था. जाने के रास्ते में दूर दूर तक फैले मैदान, उस पर की हरियाली और भयानक सन्नाटा इसके सिवा और कुछ नहीं था. मेरे लिए ये पहला ऐसा मौका था जब मै इतने ख़ूबसूरत सन्नाटे को इतनी पास से देख ही नहीं रहा था पर महसूस भी कर रहा था. आप सोच रहे होंगे की सन्नाटा और वो भी ख़ूबसूरत? लेकिन उस सन्नाटे को खूबसूरत बना रही थी सड़को पर लगी हुई लाइट.  यहाँ तक तो हमें इतना आनंद आ रहा था जैसे लग रहा हो हम जन्नत से हो कर जा रहे हो. लेकिन कहते है न  "खुशियाँ पल दो पल की मेहमान होती हैं ".
हमारे साथ भी कुछ ऐसा ही हुआ. यहाँ से शुरु होता  है हमारी उस अनोखी शाम का वो  कठिन सफ़र जिसकी हमको उम्मीद ही नहीं थी; और वैसे भी कहते है न की "अगर मुसीबत अचानक आये तो ऐसा लगता है की इससे कठिन तो कुछ हो ही नहीं सकता था ".
शुरुआत कुछ इस तरीके से हुई:
देबानंद हमें उसी रास्ते से छेंड ले जा रहा था जिस रास्ते से वो अक्सर जाया करता था. लेकिन उस दिन वो रास्ता निर्माण कार्य के कारण बंद कर दिया गया था. हालाँकि निर्माण कहा चल रहा था ये दिख नहीं रहा था. आगे नई-नई सड़क बनी हुई थी. हमने भी साइड से निकाल कर उस नई बनी हुई सड़क पर गाडी आगे बढ़ा दी. बस यही पर हमने गलती की और हमारी मुसीबतों की शुरुआत हो गई. हम मस्ती से चले जा रहे थे मौसम का आनंद लेते हुए. उस समय गाडी के पीछे मै और मयंक खड़े थे. तभी आगे हमने सड़क के बंद होने का असली कारण देखा. बात ये थी की सड़क अभी भी बन रही थी और हमने सोचा था की नई-नई सड़क बनी है इसीलिए रास्ता बंद है. अब हम तो फस गए थे. दूसरे रास्ते से जाने के लिए हमें गाड़ी घुमाना था और काफी लम्बा वापस जाना था. ये सब तो बहुत आसान है पर दिक्कत क्या है? दिक्कत ये थी की सड़क थी उचाई पर और थी बहुत पतली. उस उची और पतली सड़क पर ड्राईवर ने जब  गाड़ी घुमाना स्टार्ट किया तो उसके पीछे चढ़े हुए मेरी और मयंक की हालत ख़राब होने लगी. जैसे-जैसे गाड़ी पीछे जाती हमारी धड़कने बढती जाती. जोर का झटका तो तब लगा जब गाड़ी ढलान पर आ कर बंद हो गई. हमें लगा अगर गाड़ी रुकी नहीं तो हम तो गए काम से. पर गाड़ी तो बंद थी कभी भी लुढ़क सकती थी. जैसे ही गाड़ी रुकी मै और मयंक जल्दी से गाड़ी से कूदे; तब जा कर हमारी जान में जान आई.
फिर हमने गाड़ी को धक्का दे कर घुमाया और वापस चल पड़े दूसरे रास्ते की तरफ. लेकिन मैंने कहा ना ये तो सिर्फ शुरुआत थी. अब गाड़ी हिचकोले खाती हुई, ठुमके लगाती हुई, धीरे-धीरे आगे बढ़ने लगी. गाड़ी के साथ ऐसा क्यों होता है ये तो सभी जानते है. तो पता चला हमारी अगली मुसीबत क्या थी?
अगर नहीं पता चला तो हम बता देते है. ऐसा इसलिए क्योंकि गाड़ी का पेट्रोल ख़त्म होने वाला था. थोड़ी दूर चल कर ही गाड़ी बंद हो गई और आस-पास कोई पेट्रोल-पम्प भी नहीं था. बेचारे ड्राईवर ने कही से साइकिल का जुगाड़ किया और चला गया पेट्रोल लेने. हमने इस मौके पर भी मजे लेने की भरपूर कोशिश की और शुरू कर दिया वही पर फोटो session. उस सुनसान जगह पर फोटो शूट करने का भी एक अलग ही मजा आ रहा था. और हमने असली NITian होने का परिचय देते हुए मुसीबतों में भी ख़ुशी ढूँढ ही ली.
अब आपको कुछ उस जगह के बारे में भी बता दू. वो जगह एरोड्रम के पास की एक सुनसान सड़क थी  जहाँ अक्सर bike से stunt मारे जाते है. इस बात का पता उस सड़क पर दिख रहे tyres के निशान देख कर ही मिल जाता है. उस सड़क से काफी दूर तक फैली हुई खाली जमीन दिखती है  जिस पर हरी-हरी घास उगी हुई थी. रात में वो जगह जीतनी भयानक दिख रही थी दिन में उतनी ही प्यारी दिखती. मयंक ने तो यहाँ तक कह दिया की वो वही पर घर बनाएगा. पर जब मैंने उससे पूछा रात में ऑफिस से घर आने में कैसा लगेगा और क्या तुम्हारी धर्मपत्नी यहाँ रह पायेगी?”, तो मयंक का मुह बन गया.
खैर ये तो हुई जगह की बात. अब अपने सफ़र को आगे बढ़ाते है. थोड़ी देर में ड्राईवर पेट्रोल ले कर आ गया. तब जा कर हमारी जान में जान आई. फिर हम चल दिए अपनी मंजिल की ओर. हमारी मंजिल तो आपको याद ही होगी.
लेकिन इस बार जब गाड़ी चली तो ऐसा लगा जैसे ड्राईवर हम पर इतनी मेहनत करवाने का गुस्सा उतार रहा  हो. अब आप ही सोचिये ड्राईवर अपना गुस्सा कैसे निकालेगा? सोचिये-सोचिये. चलिए हम बता देते है. गाड़ी स्टार्ट करने के बाद ड्राईवर गाड़ी इतनी तेज चला रहा था की पीछे खड़े मेरी ओर मयंक(इस बार फिर से) की हालत ख़राब हो रही थी. तब हमें लगा यार किसी से भी पंगा लो पर ड्राईवर से कभी नहीं”. और उस पर भी वो सड़क जिससे हम जा रहे थे वो तो ऐसे ही था जैसे एक तो करेला ऊपर से नीम चढ़ा”. इतनी मुसीबतों के बीच किसी का ध्यान नहीं गया की हमारे साथ सबसे महत्त्वपूर्ण भी एक चीज थी. वो थी सरस्वती जी की मूर्ति जिसे हम पहुचाने जा रहे थे. जब हमारी इतनी बुरी हालत थी तो मूर्ति की क्या हालत हो रही होगी ये तो आप सोच ही सकते है. फिर भी किसी तरह मूर्तियों को बचाते जब हम छेंड पहुचे तब हमें राहत मिली. राहत मूर्ति पहुचाने की तो थी ही लेकिन उसे दुगना कर दिया वहाँ के बच्चों ने. वो हमसे ऐसे मिले जैसे काफी पहले से जानते हो. एक चीज जिससे मुझे सबसे ज्यादा ख़ुशी हुई वो ये देख कर की सारे छोटे बच्चे आ कर हमारा पैर छू रहे थे. उन्हें देख कर लगा की वाकई में असली भारत को देखना हो तो इन गाँव जैसे इलाके में ही जाओ”.
इस तरह वहा से मूर्ति दे कर हम चल दिए अपनी आखिरी मंजिल की ओर, बासंती कालोनी. लेकिन तभी  हमें अब तक की सबसे बड़ी समस्या का सामना करना पड़ा. क्या आप इसका अनुमान लगा सकते है? बिलकुल नहीं. इस पूरी कहानी को बनाने में जिस समस्या का हाथ था आप उसे ही नहीं अभी तक समझ पाए. कोई बात नहीं जब इतनी लम्बी कहानी हो तो ऐसा होता है. आखिर हम कभी एकाग्रचित्त हो कर कोई काम ही नहीं करते है तो हमें पता कैसे चलेगा? वैसे भी मैंने अभी तक सिर्फ एक बार ही इस बात का जिक्र किया है. अब भी नहीं समझे तो मै बता देता हूँ. गाड़ी के झटकों से मूर्ति पर असर पड़ रहा था. और यह सिर्फ असर ही नहीं बुरा असर था. हमें अपनी मेहनत पर पानी फिरता नज़र आ रहा था. फिर भी हमने हार नहीं मानी 
और बड़ी मुश्किलों से मूर्ति को संभालते हुए आखिर बासंती कालोनी पहुच ही गए. वहां हमने मूर्ति की थोड़ी सी मरम्मत की और बस हमारा काम हो गया. जब मूर्ति सही सलामत अपनी जगह पर रखा गई तब जा कर हमने सांस ली.


उस दिन मुझे लगा एक छोटा सा सफ़र भी आपको कितना कुछ सिखा सकता है. इस कहानी का अंत कैसा हुआ ये मै नहीं जानता और ना ही जानना चाहता हूँ. क्योंकि अभी तक हम बहुत संतुष्टि महसूस कर रहे हैं. लेकिन फिर भी वो हमारे लिए एक अद्भुत शाम थी. "एक अनोखी शाम". उस शाम ने हमें आनंद के पल से ले कर मुश्किल के हर उस क्षण का अनुभव कराया जो एक साथ बहुत कम मिलता है. वो शाम मेरे लिए एक यादगार शाम है. मै उसे कभी नहीं भुला सकता. और शायद इसीलिए मै अपना ये अनुभव शब्दों के रूप में उतार रहा हूँ. इससे मुझे बहुत ख़ुशी मिल रही है.  अंत में मै बस यही कहूँगा
"कोई दिन ऐसा नहीं जो कुछ हमें सिखलाता नहीं;
कुछ कम तो कुछ ज्यादा दे जाता है कभी.
ये शाम वो शाम थी;
जिसे मै भुला सकता नहीं."

7 comments:

  1. Sudhar ho raha hai , Good try indeed :-)

    Keep Writing :-|

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  2. bahut accha likha hai yaar.....
    teri script writing bhi acchi hai yaaar...

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  4. 1st of all congrats... your writing is simply awesome and heart touching...

    along with its very nice to see you people working with so much spirit and self enjoyment...

    keep it on... all the best...

    Ashutosh Bhuyan
    Engg.
    NTPC Ltd.

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  5. thank u bhaiya for motivating us... thank u very much :)

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