Thursday, February 3, 2011

ये सच है...



ये सच है;
बच्चे होते है मन के सच्चे.
पर कभी हम भी तो थे बच्चे.
कहा गई हमारी वो मासूमियत?
जो कभी हमें भगवान का रूप बनाती थी.
ऐसा क्या हो जाता है?
जो छिन जाती है बच्चो की सच्चाई.
क्या कभी किसी ने सोचा है?
कुछ तो ऐसा होता है.
पर वो है क्या चीज़?
कभी किसी ने नहीं सोचा है.
अरे,कोई सोचे भी तो कैसे?
जब सबका यही कहना है;
की "दिल तो अभी बच्चा है".
अगर दिल बड़ो का भी बच्चा है;
तो खुद को नहीं तो उन बच्चो को तो बख्शो;
जिनका दिल वाकई में बच्चा है.
मत छीनो उनका बचपन;
बस ये ही तो उनका अपना है.
कर लेने दो उन्हें भी मजा;
आखिर एक दिन उन्हें भी तो होना है बड़ा.

2 comments:

  1. अच्छी प्रस्तुति है चन्दन | सबसे ज्यादा भावुक कर देने वाली पंक्तियाँ - "कहा गई हमारी वो मासूमियत? कभी हमें भगवान का रूप बनाती थी |"
    साहित्य पढते रहो , विचारो की प्रस्तुति में मदद मिलेगी :)

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  2. kuch ke naam bata do jinase kuch fayada ho. mujhe jyada jaankari nahi hai sahitya ke baare me.

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