Wednesday, November 23, 2011

सूरज...


ये धूप कितना जलाती है हमें,
अपने से दूर हमेशा भगाती है हमें|
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हम भी कई रूपों में मानते हैं उसे,
गर्मी में दुश्मन तो ठंडी में दोस्त मानते है उसे|
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लेकिन उसकी एहमियत को तो जानते है हम,
यहाँ तक कि उसे भगवान मानते है हम|
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लेकिन वो भगवान यूँ ही नहीं बनता,
खुद को जला कर दूसरों को वो रोशनी है देता|
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दूसरों को जो जलाये उसे इंसान कहते है,
लेकिन खुद को जो जलाये उसे भगवान कहते है|

बचपन...


हमने कहा सूरज से, “थोड़ी सी हमें धूप दो”|
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उसने पूछा,”क्या करोगे दोस्त मेरी धूप का?”|
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मैंने कहा,
“उसमे खेल कर,
बचपन में फिर से लौट जाऊंगा|
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खो चुका हूँ जिस मासूमियत को,
वापिस उसे फिर लाऊंगा|
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आगे रहने की इस होड़ में,
उस मासूमियत को हमने रौंद दिया|
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खोजने पर भी मुझको,
उसका नामो-निशान तक ना मिला|
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शायद उस धूप से कुछ मासूमियत मै पा सकूँ,
हो सके तो अपने सच्चे दिल का दीदार खुद को करा सकूँ|”

Monday, November 21, 2011

रात और चाँदनी...



मैंने कहा रात से “तुम कितनी भयानक हो|
लोगों को हमेशा डराती हो”|
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तो उसने हँस कर जवाब दिया...
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“इसी डर से तो चाँदनी कि एहमियत का एहसास होता है|
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और डर को पार कर के प्यार का खूबसूरत एहसास होता है|
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 दुनिया में खूबसूरती को एक प्यारा मुकाम मिले|
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चाहे उसके लिए लोग हमें कितना भी बदनाम करें|”
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ये है रात का चांदनी से प्यार,
जिसके लिए वो तैयार है होने को बदनाम|


By
chandan

Tuesday, November 1, 2011

सर्दी का मौसम...


रात को ठंडी आहें भर के.
सुबह को अपनी बाहें खोले.
गर्मी से वो लड़ते-भिडते.
चाय कि प्याली हाथ में दे के.

इतना प्यारा है ये मौसम.
इसके आगे सब है बेदम.
इस मौसम में गर्मी ले कर.
कितना खुश होते हैं हम सब.

धूप में बच्चों कि वो हरकत.
उछल कूद करते नाक में वो दम.
ठंडी कि धूप उन्हें इतनी है भाती.
नहीं सताती उन्हें कोई भी परेशानी.

Youth का सबसे प्यारा मौसम.
मानों fashion का हो मौसम.
रंग-बिरंगे कपड़े पहने.
सबको लुभाने कि कोशिश करते.

बुजुर्गों को होती थोड़ी परेशानी.
लेकिन हल्की धूप उन्हें भी है भाती.
गरम चाय कि चुस्की ले कर.
सारी परेशानी दूर है हो जाती.

ये मौसम भी है कितना खास.
हम सब को लाता है वो एक साथ.
धूप कि हल्की गर्मी कि खातिर.
सारी family एक है हो जाती.

जाते जाते भी ये मौसम.
कर जाता है प्यारा काम.
दिलों को मिलाने कि खातिर.
दिलों के त्यौहार को बना जाता है खास.

Monday, September 19, 2011

कोई भी अपना हो ना सका...

जब भी हमने किसी को अपना माना,
हमने हमेशा धोखा ही खाया.
सोचा कुछ पराये भी हो सकते है अपने,
लेकिन शायद पराये कभी हो नई सकते अपने.
 
लेकिन कुछ लोग होते है इतने प्यारे,
लगता ही नई नहीं की वो है पराये.
ऐसा भ्रम पता नहीं क्यों होता है हमेशा?
इसी कारण दिल रोता है हमेशा.
 
करते है हम उनकी भलाई की बातें,
पर रूठ जाते है वो सुन कर हमारी बातें.
अपनी किस्मत भी कितनी अजीब है,
दूसरों को दुःख देना ही शायद अपना नसीब है.
 
अब तो लोगो से बात करने में भी लगता है डर.
कब कौन अपना बना कर दे जाये हमको गम?
शायद तन्हाई ही अपना नसीब है,
दोस्ती दुनिया की सबसे ख़राब चीज़ है.
 
दोस्तों के ऊपर बोझ रहते है हम हमेशा,
शायद इसीलिए वो रूठे रहते है हमशे हमेशा.
ऐसी किस्मत दुश्मनों को भी ना मिले,
अपना बना कर पराये करने वाले किसी को ना मिले.