Thursday, July 26, 2018

ये बारिश कितनी प्यारी है...



ये बारिश कितनी प्यारी है, धरती की तपिश को बुझाती है |
धरती और बारिश के संगम से, दुनिया सुन्दर हो जाती है |

पौधों और जानवरों को भी, ये बारिश ही नहलाती है |
दुनियाँ में फैले धुंधलेपन को, ये बारिश ही तो साफ़ कराती है |

मेंढक और झींगुरों की आवाज़ों को, हम तक ये पहुँचाती है |
दुनिया में फैली हरियाली को, पास हमारे लाती है |

दुनिया कितनी सुन्दर है, इस बात का एहसास दिलाती है |
प्यार ही प्यार फ़ैलाने का, तरीका हमें सिखाती है |

नफ़रत भरी इस दुनिया में, प्यार का पाठ पढ़ाती है |
हर गर्मी को शीतलता से जीतो, कितनी प्यारी बात बताती है |

नफ़रत अपनी गर्मी से, दुनिया को केवल जलाती है |
प्यार की बारिश इस दुनिया में, दुश्मन को भी दोस्त बनाती है |

आओ हम सब इस बारिश की बूंदों जैसे बन जाएं |
नफ़रत से जलती इस दुनिया में प्यार की बारिश कर जाये |

 इस प्यारे मौसम में, सबको बच्चा फिर से बनाते हैं |
बचपन की याद दिला कर के, प्यार ही प्यार फैलाते हैं |



Tuesday, December 6, 2016

ना मंज़िल का पता ना राहों की खबर...

ना मंज़िल का पता ना राहों की खबर है।
इस ज़िन्दगी को बेमतलब बस जिए जा रहे हैं।
है रौशनी की खोज पर अँधेरे में खड़े हैं।
ना अपनों की खबर ना परायों की सुध है।
ना जाने ज़िन्दगी के किस मोड़ पर हम खड़े हैं।
पहले थे मुस्कुराते बेवजह बेफिकर हम।
अब तो हंसने की ना वजह ना फ़िकर है।
था जीना हमे इस ज़िन्दगी को हमेशा ।
मगर उसी से क्यूँ हम लड़े जा रहे हैं ।
अगर थोड़ा बचपन फिर कोई हमको दिलाये ।
अंधेरों में रोशनी का दिया हम जलाएं ।
फिर मंज़िल तो हमको मिलेगी ही मिलेगी ।
राहें भी सुन्दर और हंसी हो उठेंगी ।

Tuesday, April 10, 2012

माँ...



फूलों कि खुशबुओं को समेटे हुए|
दिल में ममता का सागर समेटे हुए|
चेहरे पर मुस्कान हमेशा सजाये हुए|
सबकी जिम्मेदारियों को कंधे पर उठाये हुए|

एक माँ ही तो है जो चलना सिखाती है|
हाँथो से अपने हमे खाना खिलाती है|
हमारी गलतियों पर भी गले से लगाती है|
सिर पर हाथ रख कर सारे दुखों को भगाती है|

जिसकी गोद में जन्नत का बसेरा है|
आँचल में जिसके क्या रात क्या सवेरा है|
इसकी आँचल कि छाँव को तो भगवान भी तरसते हैं|
तभी तो बार बार धरती पर उतरते हैं|

क्या राम क्या यीशु,क्या कृष्ण क्या मौला?
सबकी चाहत है माँ कि आँचल में पलना|
प्यार और ममता जिसकी वजह से बने हैं|
दिल से सोचना जिसकी आदत बड़ी है|

बच्चों कि दोस्त,उनके दुखों में सहारा|
बच्चों कि गलतियों पर भी प्यार से समझाना|
ये तो वो छाँव है जो कभी हटती नहीं है|
धूप हो या पानी साथ चलती रही है|

इस दुनियाँ को दुनियाँ बनाती है माँ|
अपने दुखों को भी मुस्कान में छुपाती है माँ|
इस ममता कि मूरत के बारे में भला क्या मै बताऊँ?
उसकी आँचल कि छाँव में बस रहना मै चाहूँ|

भगवान को भी धरती पर लाती है माँ|
हमें भी किसी लायक बनाती है माँ|
कुछ शब्दों में उसको मै तोल नहीं सकता|
सागर को गागर में मैं भर नहीं सकता|

बस तुम्हे खुश रखने कि कोशिश करेंगे हम माँ|
आँखों को तुम्हारी कभी नम ना होने देंगे माँ|
हमारी खुशियों को सदा अपनी खुशियाँ तुमने माना है माँ|
अब तुम्हारी खुशियों को ही अपनी खुशियाँ हम मानेंगे माँ|

Wednesday, January 25, 2012

For My Friends...


जिंदगी के सफर में राही बहुत हैं|
लेकिन आसमान में उड़ने कि चाहत भी बहुत है|

धरती पर कदम किसी के अब पड़ते नहीं है|
मंजिल को पाने कि धुन सबको लगी है|

सबकी निगाहें बस मंजिल पर लगी हैं|
साथ चलने वालों को देखने कि फुर्सत भी नहीं है|

मंजिल पर पहुच कर भी कोई क्या करेगा?
जब साथ उसके जश्न मनाने वाला कोई ना होगा|

मंजिल को पाने की खुशी भी तभी है|
जब दोस्तों कि थपथपी इन कन्धों पर पड़ी है|

दोस्त तो इन राहों पर खुशियों की वो छांव हैं|
जो साथ हो तो हर मुश्किल रस्ता भी होता आसान है|

क्या बताऊँ इन दोस्तों के बारे में?
कल तक जो अनजान थे आज वो ही दिल की जान हैं|

साथ उनके रहो तो दुनियाँ कदमों में लगाती है|
और अकेले होने पर खुद कि जान भी बोझ सी लगाती है|

खुशियों के पल में आसमान पर उड़ते हैं|
और गम में भी ये हंसते-हँसते चलते हैं|

इन्हें ना राहों कि फिकर ना मंजिल का ठिकाना है|
राहों को ही मंजिल बना दी और हर पल को खुशियों में भिगो डाला है|

इनके साथ तो राहें भी मंजिल सी लगती हैं|
फिर मंजिल पर पहुँचने कि होड़ किसको होती है?

इन दोस्तों कि वजह से ही तकदीर भी पलटती है|
कोयले को हीरे में इनकी चाहतें ही बदलती हैं|

हमनें भी कुछ ऐसे प्यारे दोस्त पाए हैं|
जिनकी वजह से आज हम किसी लायक बन पाए हैं|

उनके साथ बिताए पलों को सहेजने कि एक चाहत है|
जिनके प्यार के आगे तो पूरी दुनियाँ कि दौलत भी फीकी लगती है|

लेकिन उनके साथ इतनी फुर्सत ही नहीं मिलती|
सहेजना तो दूर, हँसने के अलावा और कोई हरकत ही नहीं होती|

लगता है इन पलों में जिंदगी को जी लें|
क्या पता ऐसे दोस्तों का प्यार पाने को कल हम रहें ना रहें?

Wednesday, November 23, 2011

सूरज...


ये धूप कितना जलाती है हमें,
अपने से दूर हमेशा भगाती है हमें|
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हम भी कई रूपों में मानते हैं उसे,
गर्मी में दुश्मन तो ठंडी में दोस्त मानते है उसे|
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लेकिन उसकी एहमियत को तो जानते है हम,
यहाँ तक कि उसे भगवान मानते है हम|
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लेकिन वो भगवान यूँ ही नहीं बनता,
खुद को जला कर दूसरों को वो रोशनी है देता|
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दूसरों को जो जलाये उसे इंसान कहते है,
लेकिन खुद को जो जलाये उसे भगवान कहते है|

बचपन...


हमने कहा सूरज से, “थोड़ी सी हमें धूप दो”|
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उसने पूछा,”क्या करोगे दोस्त मेरी धूप का?”|
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मैंने कहा,
“उसमे खेल कर,
बचपन में फिर से लौट जाऊंगा|
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खो चुका हूँ जिस मासूमियत को,
वापिस उसे फिर लाऊंगा|
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आगे रहने की इस होड़ में,
उस मासूमियत को हमने रौंद दिया|
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खोजने पर भी मुझको,
उसका नामो-निशान तक ना मिला|
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शायद उस धूप से कुछ मासूमियत मै पा सकूँ,
हो सके तो अपने सच्चे दिल का दीदार खुद को करा सकूँ|”