Tuesday, December 6, 2016

ना मंज़िल का पता ना राहों की खबर...

ना मंज़िल का पता ना राहों की खबर है।
इस ज़िन्दगी को बेमतलब बस जिए जा रहे हैं।
है रौशनी की खोज पर अँधेरे में खड़े हैं।
ना अपनों की खबर ना परायों की सुध है।
ना जाने ज़िन्दगी के किस मोड़ पर हम खड़े हैं।
पहले थे मुस्कुराते बेवजह बेफिकर हम।
अब तो हंसने की ना वजह ना फ़िकर है।
था जीना हमे इस ज़िन्दगी को हमेशा ।
मगर उसी से क्यूँ हम लड़े जा रहे हैं ।
अगर थोड़ा बचपन फिर कोई हमको दिलाये ।
अंधेरों में रोशनी का दिया हम जलाएं ।
फिर मंज़िल तो हमको मिलेगी ही मिलेगी ।
राहें भी सुन्दर और हंसी हो उठेंगी ।

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