Saturday, February 19, 2011

ये परीक्षा...



ये परीक्षा का जो समय है,
होता कितना अजीब है.
चारों तरफ सन्नाटा,
और सारा माहौल जैसे ग़मगीन है.

अपनी शिक्षा पद्धति भी अजीब है,
एक रात ही बस इसका नसीब है.

ज्ञान की यहाँ किसी को फिक्र ही नहीं,
बस आगे जाने की होड़ है.
जो निकल गया ये उसका नसीब है,
बाकियों की यहाँ कोई क़द्र नहीं.

कुछ प्रश्नों से आंकी जाती है यहाँ होशियारी,
आया तो ठीक वरना तुम हो अनाड़ी.

अब इस स्थिति में हम क्या करे?
कैसे अपनी नैया पार करें?
कोई कुछ उपाय तो बताओ,
इस परीक्षा से हमें छुटकारा तो दिलाओ.

Thursday, February 17, 2011

दिल...


इस दिल का क्या करे?
इस पर अपना कोई बस ही नहीं.

पता नहीं किसको ये ढूँढता है?
अक्सर ये उदास रहता है.

पूछो तो कुछ बताता भी नहीं.
अपने साथ साथ हमें भी परेशान करता है.

कभी इसकी खुशियों की सीमा नहीं होती,
तो कभी गम का भी पार नहीं मिलता.
हर समय बेचैन सा रहता है.

कभी खुशियों के बीच गम ढूँढ लेता है,
तो कभी गम में खुशियाँ ढूँढता है.

इस दिल का क्या करे?
इस पर अपना कोई बस ही नहीं.

ये दुनिया...


दुनिया भी कितनी अजीब है!

कभी दिल के कितने करीब,
तो कभी कितनी दूर है.

कभी लगता है ये कितनी हसीं है,
कभी इससे बुरा कुछ और नहीं होता.

कभी रखती है हमें सर आँखों पर,
तो कभी हमें भूलती है इस तरह;
जैसे अपना कोई वजूद ही नहीं था.

आखिर ये भी तो दुनिया है,
सिर्फ लोगों का ही तो मेला है.
इतनी भीड़ में अपनी ये किस्मत कहाँ?
कि कोई हमें भी याद रखे.

हो सके तो इतना तो करने दे,
ये जिंदगी तो सुकूँ से जी लेने दे.

Tuesday, February 15, 2011

प्यार और मुश्किलें...

तूफानों के डर से, 
दरिया पार करना कैसे छोड़ दे?

दिल टूटने के डर से,
प्यार करना कैसे छोड़ दे?

प्यार लुटाने की चीज़ है,
उसे लुटाना कैसे छोड़ दे?

कोई हाथ न छोड़ दे,
इस डर से हाथ पकडना कैसे छोड़ दे?

दुनिया में कोई तो होगा ऐसा,
जो थामे रखेगा हाथ हमेशा.

यूँ तुम प्यार को ना समझो धोखा,
इसी प्यार ने तो दुनिया को है बांधे रखा.

Sunday, February 13, 2011

VALENTINE WEEK SPECIAL


FOR ROSE DAY:
गुलाब की महक से आपका दिन बन जाये,
कल आपका महबूब आपके सामने आ जाये.
तुरंत एक गुलाब का फूल तुम उठाना,
 बिना सोचे समझे बस उसे दे डालना...

FOR PROPOSE DAY:
हर किसी के दिल में जो चाहत होती है;
कहने की तमन्ना उन सभी के दिल में होती है.
हिम्मत और एक अदद मौके की तलाश होती है.
कल एक ऐसा ही मौका है उन सभी के पास;
जो कहना चाहते है अपने दिल की बात.
हो सके तो इस मौके को भुनाओ;


FOR CHOCOLATE DAY:
chocolate होते है मिठास का चिन्ह;
लेते है तुम्हारे सारे ग़मों को छीन.
एक chocolate उन्हें दे कर तो देखो;
आते कैसे है वो तुम्हारे करीब.

FOR TEDDY DAY:
खिलौनें होते हैं कितने प्यारे;
सबके दिलों को बच्चों सा बनाते.
इसीलिए खिलौनों को दिल सा भले बनाओ;
पर कभी दिल को खिलौना मत बनाओ.

FOR PROMISE DAY:
वादे क्या है,इनका क्या मोल है?
मानो तो मोती;ना मानो तो रेत हैं.
इनको जो पूरा करो, तो ख़ुशी देते ये भरपूर हैं.
ना पूरा करो तो,दिल को कुरेदते ये जरूर है.
वादे तभी करो, जब पूरा कर सको.
वरना दूसरे को धोखा देना भी तो कसूर है.

FOR KISS DAY:
होठों का मिलन,प्यार की शुरुआत है.
ये एक ख़ूबसूरत बंधन का एहसास है.
हो सके तो इसे सिर्फ महसूस करो,
क्योंकि इसका प्रदर्शन बिलकुल बेकार है.

FOR HUGG DAY:
गले मिलने से बढ़ता है प्यार;
दिलों के बीच की मिटती है दीवार.
अपने चाहने वाले को कुछ इस तरह दो प्यार;
वो भी गले मिलाने को हो जाये बेकरार.


FOR VALENTINE DAY:
प्यार क्या है? इसकी क्या परिभाषा है?
जिसने इसे किया है, उसी ने बस जाना है.
दुनिया को दिखने से ना ये कभी बढ़ा है,
और ना ही दुनिया से छुपाने से ये कभी घटा है.
प्यार वो चीज़ है,
जिसे सिर्फ चाहने वाले को बताओ.
करता जमाना इसका विरोध है,
पर पूरी दुनिया उसी पर मदहोश है.
तुम भी बस अपने चाहने को बताओ,
पूरी दुनिया में अपना तमाशा मत बनाओ.
ये दुनिया तमाशबीनों से भरी है,
जो तुम्हारे रास्ते में खड़ी है.
कर जाओ इस दुनिया को तुम पार,
और ले जाओ अपने दिलबर को अपने साथ.

Saturday, February 12, 2011

LOVE



love is a thing that comes from heart;
don't think to do it is very hard.
just try to be honest from your side;
and leave other things on other side.
don't leave love,
just because breaking of ur heart.
if u love some one,
it is not neccesary u will get a response.
don't think that,
there is nothing without Her.
just think that,
God saved u from one who never loved u by heart.

Friday, February 11, 2011

बगिया के फूल


इन रास्तों का ही तो सहारा है;
तुम्हे अपने पास बुलाना है.
अपना तो ये हाल है;
आँखों की रौशनी से रस्ता भी परेशान है.

समुन्दर की रेती से घर ना बनाओ;
बनाओ तो फिर समुन्दर से दूर बनाओ.
समुन्दर का तो वो प्यार है रेती से;
की रेती भी कुर्बान है समुन्दर पे.

कहते हैं लोग,मिल के रहो अच्छा लगता है.
दूसरों से रिश्ता बड़ा प्यारा होता है.
पर रिश्ते इतना उलझाते है;
लगता है सबसे बढ़िया अपना सूनापन होता है.

कभी-कभी आंसू ही सूनेपन का सहारा होते है.
किसी की याद में तड़प का इशारा होते है.
आंसुओं को इतना कमजोर मत समझो;
भगवान को भी जमीं पर लाने का सहारा होते है.

दूरियां प्यार का एहसास कराती हैं,हो सकता है.
पर नजदीकियों से प्यार बढ़ता है,जरूरी तो नहीं.
जब तक इजहारे प्यार ना करो मेरे दोस्त,
नजदीकियां भी जीना दुश्वार करती हैं.

कभी-कभी मांगने में भी अच्छा लगता है;
मिलने पर वो कितना प्यारा लगता है.
गम के बीच ही खुशियों की एहमियत होती है.
खुशियाँ ही खुशियाँ हो तो वो भी बड़ी परेशान करती हैं.

हमने हमेशा दिल से काम लिया,
इसीलिए लोगों ने बड़ा परेशान किया.
हमने भी है ठाना की ज़माने को हराएँगे,
हम तो सिर्फ दिल से ही इन्हें अपना बनाएँगे.

प्यार सूरत नहीं,दिलों के मिलन का है नाम.
ये सूरत ही है,जिसने प्यार को किया कई बार बदनाम.
हो सके तो दिल की नजर से सूरत को देखो;
कभी सूरत पर अपना दिल मत दे बैठो.

हिम्मत उस बला का नाम है,
जो तूफानों को भी चीर देती है.
अगर हिम्मत है मेरे दोस्त ,
तो हम तो बचेंगे ही,
पर तिनका भी ना डूबने पायेगा.

आसमाँ के नीचे की जिंदगियों से ही तो ज़माना चलता है.
उनके खून की गर्मी से ही तो ए सी का असर पहुचता है.
एहसान मानो इन जिंदगियों का,
इन्ही के बूते तो भगवान भी जमीं पर रहता है.

Monday, February 7, 2011

एक अनोखी शाम


कहते है मुसीबत जब आती है तो चारों तरफ से आती है. शायद कुछ ऐसा ही हुआ हमारे साथ  उस  शाम . वो  शाम कई मायनों में हमारे लिए यादगार है.
उस शाम को मै और मेरे दो दोस्त(मयंक जोशी और देबानंद माझी) सरस्वती पूजा के लिए मूर्ति ले कर जा रहे थे. देबानंद को छेंडमें और मुझे और मयंक को बासंती कालोनीमें मूर्ति देना था. हम तीनो ने एक छोटी सामान उठाने वाली गाड़ी बुक की. मूर्ति खरीद कर हम पहले छेंड की तरफ की चले. उस समय हम मस्ती करने के मूड में थे; इसीलिए हमने decide किया की हम ट्रक के पीछे खड़े हो कर चलेंगे. पहले मै और देबानंद पीछे खड़े हुए. वो शाम का मनोहर मौसम और उस पर छेंड का सुहावना सफ़र; बड़ा मजा आ रहा था. जाने के रास्ते में दूर दूर तक फैले मैदान, उस पर की हरियाली और भयानक सन्नाटा इसके सिवा और कुछ नहीं था. मेरे लिए ये पहला ऐसा मौका था जब मै इतने ख़ूबसूरत सन्नाटे को इतनी पास से देख ही नहीं रहा था पर महसूस भी कर रहा था. आप सोच रहे होंगे की सन्नाटा और वो भी ख़ूबसूरत? लेकिन उस सन्नाटे को खूबसूरत बना रही थी सड़को पर लगी हुई लाइट.  यहाँ तक तो हमें इतना आनंद आ रहा था जैसे लग रहा हो हम जन्नत से हो कर जा रहे हो. लेकिन कहते है न  "खुशियाँ पल दो पल की मेहमान होती हैं ".
हमारे साथ भी कुछ ऐसा ही हुआ. यहाँ से शुरु होता  है हमारी उस अनोखी शाम का वो  कठिन सफ़र जिसकी हमको उम्मीद ही नहीं थी; और वैसे भी कहते है न की "अगर मुसीबत अचानक आये तो ऐसा लगता है की इससे कठिन तो कुछ हो ही नहीं सकता था ".
शुरुआत कुछ इस तरीके से हुई:
देबानंद हमें उसी रास्ते से छेंड ले जा रहा था जिस रास्ते से वो अक्सर जाया करता था. लेकिन उस दिन वो रास्ता निर्माण कार्य के कारण बंद कर दिया गया था. हालाँकि निर्माण कहा चल रहा था ये दिख नहीं रहा था. आगे नई-नई सड़क बनी हुई थी. हमने भी साइड से निकाल कर उस नई बनी हुई सड़क पर गाडी आगे बढ़ा दी. बस यही पर हमने गलती की और हमारी मुसीबतों की शुरुआत हो गई. हम मस्ती से चले जा रहे थे मौसम का आनंद लेते हुए. उस समय गाडी के पीछे मै और मयंक खड़े थे. तभी आगे हमने सड़क के बंद होने का असली कारण देखा. बात ये थी की सड़क अभी भी बन रही थी और हमने सोचा था की नई-नई सड़क बनी है इसीलिए रास्ता बंद है. अब हम तो फस गए थे. दूसरे रास्ते से जाने के लिए हमें गाड़ी घुमाना था और काफी लम्बा वापस जाना था. ये सब तो बहुत आसान है पर दिक्कत क्या है? दिक्कत ये थी की सड़क थी उचाई पर और थी बहुत पतली. उस उची और पतली सड़क पर ड्राईवर ने जब  गाड़ी घुमाना स्टार्ट किया तो उसके पीछे चढ़े हुए मेरी और मयंक की हालत ख़राब होने लगी. जैसे-जैसे गाड़ी पीछे जाती हमारी धड़कने बढती जाती. जोर का झटका तो तब लगा जब गाड़ी ढलान पर आ कर बंद हो गई. हमें लगा अगर गाड़ी रुकी नहीं तो हम तो गए काम से. पर गाड़ी तो बंद थी कभी भी लुढ़क सकती थी. जैसे ही गाड़ी रुकी मै और मयंक जल्दी से गाड़ी से कूदे; तब जा कर हमारी जान में जान आई.
फिर हमने गाड़ी को धक्का दे कर घुमाया और वापस चल पड़े दूसरे रास्ते की तरफ. लेकिन मैंने कहा ना ये तो सिर्फ शुरुआत थी. अब गाड़ी हिचकोले खाती हुई, ठुमके लगाती हुई, धीरे-धीरे आगे बढ़ने लगी. गाड़ी के साथ ऐसा क्यों होता है ये तो सभी जानते है. तो पता चला हमारी अगली मुसीबत क्या थी?
अगर नहीं पता चला तो हम बता देते है. ऐसा इसलिए क्योंकि गाड़ी का पेट्रोल ख़त्म होने वाला था. थोड़ी दूर चल कर ही गाड़ी बंद हो गई और आस-पास कोई पेट्रोल-पम्प भी नहीं था. बेचारे ड्राईवर ने कही से साइकिल का जुगाड़ किया और चला गया पेट्रोल लेने. हमने इस मौके पर भी मजे लेने की भरपूर कोशिश की और शुरू कर दिया वही पर फोटो session. उस सुनसान जगह पर फोटो शूट करने का भी एक अलग ही मजा आ रहा था. और हमने असली NITian होने का परिचय देते हुए मुसीबतों में भी ख़ुशी ढूँढ ही ली.
अब आपको कुछ उस जगह के बारे में भी बता दू. वो जगह एरोड्रम के पास की एक सुनसान सड़क थी  जहाँ अक्सर bike से stunt मारे जाते है. इस बात का पता उस सड़क पर दिख रहे tyres के निशान देख कर ही मिल जाता है. उस सड़क से काफी दूर तक फैली हुई खाली जमीन दिखती है  जिस पर हरी-हरी घास उगी हुई थी. रात में वो जगह जीतनी भयानक दिख रही थी दिन में उतनी ही प्यारी दिखती. मयंक ने तो यहाँ तक कह दिया की वो वही पर घर बनाएगा. पर जब मैंने उससे पूछा रात में ऑफिस से घर आने में कैसा लगेगा और क्या तुम्हारी धर्मपत्नी यहाँ रह पायेगी?”, तो मयंक का मुह बन गया.
खैर ये तो हुई जगह की बात. अब अपने सफ़र को आगे बढ़ाते है. थोड़ी देर में ड्राईवर पेट्रोल ले कर आ गया. तब जा कर हमारी जान में जान आई. फिर हम चल दिए अपनी मंजिल की ओर. हमारी मंजिल तो आपको याद ही होगी.
लेकिन इस बार जब गाड़ी चली तो ऐसा लगा जैसे ड्राईवर हम पर इतनी मेहनत करवाने का गुस्सा उतार रहा  हो. अब आप ही सोचिये ड्राईवर अपना गुस्सा कैसे निकालेगा? सोचिये-सोचिये. चलिए हम बता देते है. गाड़ी स्टार्ट करने के बाद ड्राईवर गाड़ी इतनी तेज चला रहा था की पीछे खड़े मेरी ओर मयंक(इस बार फिर से) की हालत ख़राब हो रही थी. तब हमें लगा यार किसी से भी पंगा लो पर ड्राईवर से कभी नहीं”. और उस पर भी वो सड़क जिससे हम जा रहे थे वो तो ऐसे ही था जैसे एक तो करेला ऊपर से नीम चढ़ा”. इतनी मुसीबतों के बीच किसी का ध्यान नहीं गया की हमारे साथ सबसे महत्त्वपूर्ण भी एक चीज थी. वो थी सरस्वती जी की मूर्ति जिसे हम पहुचाने जा रहे थे. जब हमारी इतनी बुरी हालत थी तो मूर्ति की क्या हालत हो रही होगी ये तो आप सोच ही सकते है. फिर भी किसी तरह मूर्तियों को बचाते जब हम छेंड पहुचे तब हमें राहत मिली. राहत मूर्ति पहुचाने की तो थी ही लेकिन उसे दुगना कर दिया वहाँ के बच्चों ने. वो हमसे ऐसे मिले जैसे काफी पहले से जानते हो. एक चीज जिससे मुझे सबसे ज्यादा ख़ुशी हुई वो ये देख कर की सारे छोटे बच्चे आ कर हमारा पैर छू रहे थे. उन्हें देख कर लगा की वाकई में असली भारत को देखना हो तो इन गाँव जैसे इलाके में ही जाओ”.
इस तरह वहा से मूर्ति दे कर हम चल दिए अपनी आखिरी मंजिल की ओर, बासंती कालोनी. लेकिन तभी  हमें अब तक की सबसे बड़ी समस्या का सामना करना पड़ा. क्या आप इसका अनुमान लगा सकते है? बिलकुल नहीं. इस पूरी कहानी को बनाने में जिस समस्या का हाथ था आप उसे ही नहीं अभी तक समझ पाए. कोई बात नहीं जब इतनी लम्बी कहानी हो तो ऐसा होता है. आखिर हम कभी एकाग्रचित्त हो कर कोई काम ही नहीं करते है तो हमें पता कैसे चलेगा? वैसे भी मैंने अभी तक सिर्फ एक बार ही इस बात का जिक्र किया है. अब भी नहीं समझे तो मै बता देता हूँ. गाड़ी के झटकों से मूर्ति पर असर पड़ रहा था. और यह सिर्फ असर ही नहीं बुरा असर था. हमें अपनी मेहनत पर पानी फिरता नज़र आ रहा था. फिर भी हमने हार नहीं मानी 
और बड़ी मुश्किलों से मूर्ति को संभालते हुए आखिर बासंती कालोनी पहुच ही गए. वहां हमने मूर्ति की थोड़ी सी मरम्मत की और बस हमारा काम हो गया. जब मूर्ति सही सलामत अपनी जगह पर रखा गई तब जा कर हमने सांस ली.


उस दिन मुझे लगा एक छोटा सा सफ़र भी आपको कितना कुछ सिखा सकता है. इस कहानी का अंत कैसा हुआ ये मै नहीं जानता और ना ही जानना चाहता हूँ. क्योंकि अभी तक हम बहुत संतुष्टि महसूस कर रहे हैं. लेकिन फिर भी वो हमारे लिए एक अद्भुत शाम थी. "एक अनोखी शाम". उस शाम ने हमें आनंद के पल से ले कर मुश्किल के हर उस क्षण का अनुभव कराया जो एक साथ बहुत कम मिलता है. वो शाम मेरे लिए एक यादगार शाम है. मै उसे कभी नहीं भुला सकता. और शायद इसीलिए मै अपना ये अनुभव शब्दों के रूप में उतार रहा हूँ. इससे मुझे बहुत ख़ुशी मिल रही है.  अंत में मै बस यही कहूँगा
"कोई दिन ऐसा नहीं जो कुछ हमें सिखलाता नहीं;
कुछ कम तो कुछ ज्यादा दे जाता है कभी.
ये शाम वो शाम थी;
जिसे मै भुला सकता नहीं."