Tuesday, April 10, 2012

माँ...



फूलों कि खुशबुओं को समेटे हुए|
दिल में ममता का सागर समेटे हुए|
चेहरे पर मुस्कान हमेशा सजाये हुए|
सबकी जिम्मेदारियों को कंधे पर उठाये हुए|

एक माँ ही तो है जो चलना सिखाती है|
हाँथो से अपने हमे खाना खिलाती है|
हमारी गलतियों पर भी गले से लगाती है|
सिर पर हाथ रख कर सारे दुखों को भगाती है|

जिसकी गोद में जन्नत का बसेरा है|
आँचल में जिसके क्या रात क्या सवेरा है|
इसकी आँचल कि छाँव को तो भगवान भी तरसते हैं|
तभी तो बार बार धरती पर उतरते हैं|

क्या राम क्या यीशु,क्या कृष्ण क्या मौला?
सबकी चाहत है माँ कि आँचल में पलना|
प्यार और ममता जिसकी वजह से बने हैं|
दिल से सोचना जिसकी आदत बड़ी है|

बच्चों कि दोस्त,उनके दुखों में सहारा|
बच्चों कि गलतियों पर भी प्यार से समझाना|
ये तो वो छाँव है जो कभी हटती नहीं है|
धूप हो या पानी साथ चलती रही है|

इस दुनियाँ को दुनियाँ बनाती है माँ|
अपने दुखों को भी मुस्कान में छुपाती है माँ|
इस ममता कि मूरत के बारे में भला क्या मै बताऊँ?
उसकी आँचल कि छाँव में बस रहना मै चाहूँ|

भगवान को भी धरती पर लाती है माँ|
हमें भी किसी लायक बनाती है माँ|
कुछ शब्दों में उसको मै तोल नहीं सकता|
सागर को गागर में मैं भर नहीं सकता|

बस तुम्हे खुश रखने कि कोशिश करेंगे हम माँ|
आँखों को तुम्हारी कभी नम ना होने देंगे माँ|
हमारी खुशियों को सदा अपनी खुशियाँ तुमने माना है माँ|
अब तुम्हारी खुशियों को ही अपनी खुशियाँ हम मानेंगे माँ|

1 comment:

  1. "सबकी जिम्मेदारियों को कंधे पर उठाये हुए| एक माँ ही तो है जो चलना सिखाती है|" वाह क्या अभिव्यक्ति है भाई ... माँ एक ऐसा व्यापक और संवेदनशील विषय है जिसकी कोई तुलना ही नहीं है... अच्छा लिखा है... :) बधाई

    ReplyDelete